गाय-भैंसों के इस जानलेवा रोग से रहें सावधान, 15 से 20 दिन में ले सकता है जान !

कई बार जानकारी की कमी या फिर लापरवाही की वजह से पशुपालकों को अपने दुधारु पशुओं से हाथ धोना पड़ जाता है । कई बीमारियां ऐसी हैं जो चुपके से दाखिल होती हैं और इलाज न होने पर बड़े जोखिम का सबब बन जाती हैं । ऐसी ही एक समस्या है थिलेरियोसिस, जिसका समय पर उपचार न करवाने पर लेने के देने पड़ सकते हैं। आइये, इसे डिटेल में जानते हैं ।

थिलेरियोसिस पशुओं में होने वाला एक गंभीर एवं जानलेवा रोग है, जो थेलेरिया (Theileria) नामक रक्त परजीवी (blood parasite) के कारण होता है। गाय और भैंसों में यह रोग मुख्य रूप से Theileria annulataऔर भेड़-बकरी में Theileria ovisनामक परजीवी से फैलता है। यह रोग विशेष रूप से कम उम्र के बछड़ों, बछड़ियों, विदेशी एवं संकर नस्ल की गायों (crossbred cows) में अधिक पाया जाता है। दरअसल, Hyaloma प्रजाति की कीलनी संक्रमित पशु का खून चूसते समय परजीवी अपने शरीर में ले लेती है और जब किसी स्वस्थ पशु को काटती है, तो लार के माध्यम से परजीवी उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। कीलनी एक प्रकार का छोटा कीड़ा है जो पशुओँ के शरिर में चिपटा रहता है और उनका रक्त पीता है ।


रोग के प्रमुख लक्षण

थिलेरियोसिस से ग्रसित पशु (Theileriosis in cattle) में लगातार तेज बुखार रहता है। स्कैपुलर (कंधे के पास) की लसिका ग्रंथियों में सूजन दिखाई देती है। भूख कम हो जाती है और खून की कमी (Anemia in cattle) होने लगती है। नाक-आंख से पानी बहना, खांसी, तेज धड़कन, कब्ज या दस्त जैसे लक्षण भी दिखाई देते हैं। कुछ मामलों में खूनी दस्त, पीलिया के लक्षण और मूत्र का पीला रंग भी देखा जाता है। पशुओं में दुग्ध उत्पादन में भारी गिरावट (decline in milk production in dairy animals) आ जाती है।


रोग की पहचान और उपचार

इस रोग की पहचान लक्षणों के आधार पर और पशु के शरीर पर कीलनियों (ticks on the animal’s body) की मौजूदगी से की जा सकती है। अक्सर खून के धब्बे की माइक्रोस्कोपिक जांच, लिंफ नोड या लिवर की बायोप्सी की जाती है। आधुनिक जांच विधियों जैसे पीसीआर (PCR) और सीएफटी से भी रोग की पहचान संभव है। एक बार रोग की पहचान के बाद उपचार का काम शुरू होता है । पशु चिकित्सक की सलाह से ब्यूपारवाक्विनोन (Buparvaquone) इंजेक्शन दिया जाता है। खून की कमी होने पर आयरन एवं सहायक दवाएं भी दी जाती हैं।


रोग की रोकथाम

जाहिर है, थिलेरियोसिस से बचाव के लिए कीलनी (चिचड़) पर नजर और नियंत्रण रखना सबसे जरूरी है। पशु बाड़े की नियमित साफ-सफाई और कीटनाशकों का छिड़काव बहुत जरूरी है । 2 वर्ष से अधिक उम्र की गायों एवं बछड़ों को Rakshavac-T  टीका गर्दन में त्वचा के नीचे लगाया जाता है, जिसे हर साल नियम से लगवाना चाहिए।  हालांकि गर्भवती पशुओं को यह टीका नहीं लगाया जाता। साथ ही संतुलित आहार और उचित आवास प्रबंधन भी रोग नियंत्रण में सहायक है।


गर्मी-बरसात में रहें सावधान

अभी ठंड का मौसम है लेकिन ध्यान रहे कि गर्मी-बरसात में उच्च तापमान या आर्द्रता (humidity) के कारण कीलनियों (Ticks) की संख्या तेजी से बढ़ जाती है।  ऊपर बताये गए लक्षणों पर नजर रखें और बीमारी हो ही जाए तो फौरन उपचार करवायें । अगर 15–20 दिनों के भीतर उपचार न मिले, तो पशु की मृत्यु भी हो सकती है। यह एक घातक रोग जरूर है लेकिन डर से नहीं, सही जानकारी और सूझबूझ से काम लें ।

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